सरकार (लघुकथा)

22 05 2010

-गंगा सहाय मीणा

मैं 14-15 साल का हो गया था लेकिन मैंने कभी सरकार को नहीं देखा. मैं किताबों-अखबारों में पढकर और लोगों से सुन-सुनकर तंग आ गया था कि सरकार ये कर रही है, वो कर रही है, सरकार ने ये कहा, वो कहा. आखिर सरकार है कौन, कैसी दिखती है? बोतल से निकले जिन/भूत की तरह तो नहीं? ये सवाल मुझे उन दिनों बहुत परेशान करता था.

अंततः एक दिन मेरा भाग्य जागा और मुझे सरकार के दर्शन हो गए. मैं अपने पिताजी के साथ पास के शहर गया, वहां मुझे सरकार एक तिराहे पर खडी दिखी. सरकार एक जीप की शक्ल में थी, जिसमें 3-4 पुलिसवाले थे. जीप पर सरकार का नाम लिखा हुआ था- राजस्थान सरकार. सरकार को जीप के रूप में देखकर पहले तो आश्‍चर्य हुआ लेकिन बाद में सोच लिया कि लोग कहते हैं कि सरकार सर्वशक्तिशाली है, इसलिए बहुरूपिया भी होगी. अपनी आवश्यतकतानुसार रूप बदल लेती होगी.

सरकार तिराहे पर जीप की शक्ल में आकर रुकी. उसे देखते ही आसपास के माहौल में सक्रियता आ गई. पुलिस वाले भी जीप में से उतर कर सक्रिय हो गए. वहां खडे ऑटो रिक्शों की हवा निकालने लगे और रिक्शा चालकों को गाली और थप्पड मारने लगे. रिक्शेवाले हवारहित ट्यूब वाले रिक्शों को भी लेकर भी दौड पडे.

सरकार को मैंने पहली बार देखा था. सारी घटना का कुछ कार्य-कारण समझ में नहीं आया. लेकिन उसे देखकर मुझे भी डर लगने लगा





झांकी

24 02 2010

12 साल का मोइन अपने अब्‍बू के साथ बडी जिद करने के बाद राजपथ 26 जनवरी की झांकी देखने पहुंचा. उसको पूरा कार्यक्रम मजेदार लगा. सबसे आकर्षक लगी विभिन्‍न राज्‍यों और मंत्रालयों की झांकियां.

”अब्‍बू ये क्‍या है?” हिमाचल प्रदेश की झांकी देखकर उसने पूछा.

”बेटा ये हिमाचल प्रदेश की झांकी है” अब्‍बू बोला

”झांकी क्‍या होती है?”

”झांकी….. यानी किसी जगह की झलक…. यानी इससे हम अंदाजा लगा सकते हैं कि वह राज्‍य कैसा होगा? झांकी उसकी तस्‍वीर पेश करती है.” अब्‍बू ने पूरी कोशिश कर ‘झांकी’ को परिभाषित किया.

कुछ देर बाद दिल्‍ली की झांकी आई. अब्‍बू ने मोइन को बताया कि यह दिल्‍ली की झांकी है.

”लेकिन यह तो अधूरी है…” मोइन ने परेशान होते हुए कहा, ”इसमें हमारी झुग्‍गी की तस्‍वीर नहीं है”








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