अनाज के दो बार यानी….

24 09 2009

पूर्वी राजस्थान में जेठ का एक दिन। धूप ऐसी कि लगता है थोड़ी देर में पेड़-पौधे, मानव सभी मोम की तरह पिघल जायेंगे। सूर्य देवता पता नहीं सभी से अपना कौनसा हिसाब चुकता करने पर तुले हुए थे! रही-सही कसर जीवनदायिनी हवा अपना ज्वालामय रूप धारण कर पूरा कर रही थी। जिसका एका झौंका किसी को भी झुलसाने में सक्षम था। ऐसे में पप्पू कँडेरा एक आम के पेड़ के नीचे बैठा उसकी रखवाली कर रहा था। नुकसान का खतरा पशु-पक्षियों से तो था ही,, लेकिन सबसे बड़ा खतरा तो गाँव के उन लोगों से था जो उसकी जरा सी असावधानी के वक्त दर्जनों कैरियों (कच्चे आम) के भार से आम को मुक्त कर देते थे।
वह उस आम का कुछ दिनों का मालिक था। कुछ दिनों का मालिक इसलिए क्योंकि वह आम का पेड़ उसका अपना नहीं था। उसने तो वह तब तक के लिए खरीदा था जब तक उसमें उस बार फल थे।
उस आम का असली मालिक सुरज्ञान सिंह था। उससे पप्पू कँडेरे ने वह आम लगभग दो-तीन महीने के लिए (जब तक उसमें फल थे तब तक के लिए) 250 रुपये में खरीदा था। पप्पू एक-डेढ़ महीने से उसकी रखवाली कंजूस की संचित राशि की तरह कर रहा था।
वह बार-बार खड़ा होकर वह पक्षियों को उड़ा रहा था, ‘हुर्र हा..! हुर्र हुर्र हा…! हरिया हरिया हो.. हो…! हुर्र हे..! हुर्र हे… हे…।’
वह पक्षियों को उड़ाकर बैठा ही था कि सामने से गबरू आता हुआ दिखाई दिया। पास आने पर पप्पू ने गबरू का अभिवादन किया- ‘राम राम गबरू भाई!’
‘राम राम पप्पू भाई, राम राम।’
‘का हो रोय गबरू भाई, क्हाँ सू दौड़ लग रीय या दुपहरा में?’
‘का होयगौ या दुपहरा में! आर एक खेत की डौड़ (मेड़) करणी, बाईय करिर आ रऊँ । और तू बता तेरे और तेरे आम के समसार! का कछु नफ़ा दीख रोय …?
‘का गबरू भाई, नफा कायकोय! दो महीना तो होगे या गरमी में भुँजतै, पतो नईं अबी कितनो और भुँजनोय? तब जार्य अगर भगवान की मरजी होई तो सौ-पचास रुपट्टी दीखंैगी। आँधी-भभूड़ौ आगौ तो एक दिन मेंई सब काम तमाम हो जायगौ। भौत बेकार सौदाय, पर का करै, या गरमी में कछु टैम-पास कू तो चैय! काम तो क्हँई है नईं, सोची न्यहाँई टैम-पास कर ले!’
‘प्यास लगरी होयगी! या बाल्टी में पाणी लाऊँ…? पप्पू ने रस्सी-बाल्टी उठाते हुए कहा।
‘ला आर मैं पी आऊँगौ, तू काई कू परेशान होवै!’ गबरू ने कहा और पप्पू से रस्सी बाल्टी लेकर वह समीप ही स्थित कुँए से पानी खींचकर पीने चला गया। उसने पप्पू को पानी नहीं लाने दिया इसका कारण यह नहीं था कि वह पप्पू को परेशानी नहीं देना चाहता था बल्कि इसका असली कारण था पप्पू का कँडेरा होना।
‘आर अबकै तो अकाल पड़रौय, कुँआन में पाणीई नीय!’ गबरू ने कुँए में पानी की स्थिति का जायजा लेते हुए बताया, ‘बस्स! एक डबरा सौ बचरोय जे से पीवे कू पाणी निकड़ाय, जब ई डबरा सूखगौ तो आदमी और जिनावर सब प्यासे मर जायँगे!’
‘हाँ भैया दीख तो इस्योई रिह्योय…!’
‘पतो नी इन्दर म्हार्याज आपान सू काई कू नाराज होरोय…?’
‘गिर्राज जी म्हार्याज बी कछु किरपा नी कर्रो..!’
‘गिर्राज जी की तो तिलकडंडो और पिरकम्मा रोजीना चलरीय…।’
‘पतो नी भगवान हमारी किसी परिच्छा ले रोय?’
‘भाई जल्दी मेह नी बरस्यो तो मवेशी या दुप्हेरा में भड़िक-भड़िकिर मर जायगी!’
‘हाँ भाई, अब तक 20-25 जिनावर तो मरई गए होंगे और देख बिचार्ये काड़ू खुमार और गब्बू नाथ्अ तो झकर (लू) लेगी…!’
‘का बणै भैया, भगवान कै आगै कौण की चलै? जो बाकी मरजीअ ऊई होयगौ!’
‘हाँ भैया…!’
‘अच्छो तो भाई पप्पू! घर कू चलूँ, अमार (देर) हो रीय! घर का बाट देखरा होयगा। बिसअ भूक बी लग्याई, सुबअ थोड़ो सो कलेऊ कर्र आयौ।’
‘बैठ भाई, थोड़ी देर में सचिन की मइयो रोटी लेर आती होयगी।’
‘अरे चलूँ भाई, अमार हो रीय!’ जब गबरू उसके हाथ का पानी नहीं पी सकता था तो उसके घर की रोटी कैसे खा सकता था!
‘कोई बात नी भैया, जिसी तेरी मरजी! लै, ये तीन-चार कैरी (कच्चे आम) ले जा, छुरेट सरबत करिर खा लिंगे।’ पप्पू कुछ कैरी निकालकर देते हुए बोला।
‘हाँ भाई छुरेटन कू सरबत की मनमें तो आवै, पर घर में आम नींय, का करै!’ गबरू ने चुपचाप से कैरी ली और घर का रास्ता देखा।
पप्पू भी उसकी ओर देखने लगा, साथ ही उस रास्ते में दूर-दूर तक अपनी घरवाली को खोजने लगा जो रोटी लेकर आने वाली थी। जब उसकी निगाहों को कहीं भी दूर तक वह नहीं दिखी तो वे लौट आई। पप्पू अकेलेपन की रिक्तता को भरने के लिए कुछ गुनगुनाने लगा-
‘ए… सैंदा भाएला नै पटिक नड़ा में रिगड़ी बणा दी रे…,
रे… रे… सैंदा भाएला नै….,
ओय…. ओय… सैंदा भाएला नै….,
पटिक नड़ा में रिगड़ी बणा दी रे।
ए… जी  लहंगा नीबू पेै सुकायो,
खट्टी होगी कणिया.. हे …हे।
लहंगा नीबू पै सुकायो…..।’

‘ई का अंट-संट गा रेओ जी! कतई सरम नी आय का?’ पप्पू को एक परिचित सा मधुर स्वर सुनाई दिया। देखा तो उसकी पत्नी भन्तो पास में ही खड़ी हुई दिखाई दी। कंधों पर डेढ़-एक साल का एक बच्चा बैठाए हुए और सिर पर रोटियों का टिप्पन रखे हुए। एक हाथ से वह बालक और टिप्पन पकड़े हुए। साथ में एक 4-5साल की लड़की, जो दूसरा हाथ पकड़े हुए थी।
‘थमारी सरम क्हाँ गई जी! कोई भऊ-भौंटिया न्य्होर निकड़ैगी और बानै सुण ली तो जाणै का का सोचैगी!’ भन्तो ने टिप्पन नीचे रखते हुए कहा।
‘कोई भऊ-भौंटिया च्यों आयगी न्यहाँ या दुपहरा में! खैर पहलै न्यौ बता कै तैने इतेक अमार किस्अ कर ली? मोकू तो भौत जोर से भूक लग रीय।’ पप्पू ने टिप्पन अपनी ओर खिसकाते हुए कहा।
‘भूक लगरीय तो अब खा लेओ। घर-गिरस्ती में छोटे-छोटे काम करवे में अमार होई जाय। खेड़ में रमिया (बूढ़ी भैंस) कू पाणी पियावे गई। बाकू साँदी करी… रोटी करी… छोरा सचिनै टूसन प्हौंचावे गई। रो-रोर्य बड़ी मुश्किलन से पढ़वे गयौ। न्यौ कैर्औ पढ़वे नी जाऊँ, माड़साब रोजीना फीस माँगै। मैं गई बाय प्हॅुुंचावे और माड़साबन से कैर आई कि माड़साबौ एकाद दिन्या में प्हुॅचा दिंगे थमारे पैसान नै। माड़साबन कै बी समाई नईंय। इतेक पढ़े-लिख्ये, तब बी न्यो नी सोचै कि इन गरीबन केै अब क्हाँ से पइसा आयंेगे!’
‘टूसन पढ़ाबौ इतेक जरूरी थोड़ीय, अगर पढ़ैगो तो इक्सूल कौ पढ़बौ ही भौत्अ। मैं तो ई कऊँगो कि सचिन कौ टूसन बन्द करवा दे। माड़साबन कू पइसा क्हाँ से दैंगे!’
‘थमकू तो न्यहाँ हार में रह-रहर्अ जाणै का होगो! सब दुनिया के बालिक टूसन पढ़रे और एक ये कह र्अे कै टूसन बन्द कर दे। छोरा टूसन नी पढ़ैगो तो और बालिकिन से हुस्यार किसै होयगौ? बाकौ दिमाक तो तेज्अ, बस्स ऊ पढ़ै कम्मअ। और बालिकिन कै बिराबिर पढ़ ले तो सबसे ज्यादा नम्बर लियाअ। टूसन के बहाने ऊ कछु पढ़ तो लेअ, नी तो या झकराड़े में और का करतौ… न्यहाँ थमारै संग झकर खातौ, क इतअ-बितअ लक्खण झड़ातौ डोलतौ…। थम मूरख रहगे तो न्यो सोचै सुल्त्यान बी मूरख रह जाय! करज लेर पढ़ायँगे, पर सब बालिकिन नै पढ़ायँगे। अबकै इक्सूल खूटंगे तब लाली कौ बी नाम लिखवा दिंगे! च्यों लाली जायगी न पढ़बे?
‘हाँ मैं भैया कै लारै जाऊँगी और अ अनार बाला, आ आम बाला और गिनती सीख्ूाँगी। लालाय बी गोदी में बैठार्य ले जाऊँगी, लाला चलैगो नी? लाली ने छोटे बच्चे की मैली-कुचैली बनियान खींचते हुए कहा। बच्चा रोने लगा।
‘हाँ, पढ़ो… सब पढ़ो …या थारी डोकरीय बी ले जाऔ पढ़बे। सब के सब कलैट्टर हो जाओ! पइसा थमारो बाप देयगौ!’ पप्पू ने एक नजर लाली की ओर तथा फिर भन्तो की ओर देखकर झँुझलाते हुए कहा।
‘हाँ, बाप मइया दोनूँ देइंगे। कैसे बी हो… चाहे दिन-र्आत मजूरी करणी पड़ै पर बालिकिन की जिन्दगी सुधार्येंगे। हम थोड़ो ज्यादा दुख पा लिंगे तो का हो जायगौ? बालिक पढ़ गए तो कम से कम उनकू तो चैन हो जायगौ। और सुल्त्यान अच्छी निकड़ी तो बुढ़ापे में थोड़ो भौत सुख हमकू बी मिल जायगौ!’ भन्तो ने सन्तोष भरी मुद्रा मंे कहा।
‘कहाँ इनसे सुख की आस कर रही हो, दो दिन पीछै येई लट्ठ लेर मारवे तैयार हो जायँगे। सुल्त्यान से ज्यादा आस नी करणी चैय!’ पप्पू ने अविश्वास भाव से कहा।
‘ऊ तो मैं बी जाणूँ। आँपान की तो अब थोड़ी सी जिन्दगी बचीय, ऊपर बाड़ौ जिस्अ चायगौ, बिस्अ कट जायगी। मैं तो देवी मैया से याई माँगू, के मैया म्हारा बच्चान की जिन्दगी सुधार्य दै।’ भन्तो ने हाथ खुद के माथे से लगाते हुए कहा।
‘ये सब बात पीछै हो जायँगी। जा पहलै कुँआ पै से ताजा पाणी लिआ, जेसे रोटी खा लूँ।’ पप्पू ने टिप्पन खोलते हुए कहा।
भन्तो गोद से बच्चे को नीचे उतार पानी लेने चली, पीछे से पप्पू का झल्लाहट भरा स्वर सुनाई पड़ा, ‘साग कहाँ है, आज बी साग नी राँद्यो का?’
‘साग क्हाँ से आयगौ? काँदे (प्याज) है और कैरी की चटनी बाँट्य लेओ। जब तक मैं पाणी लेर आऊँ, तब तक काँदे से खाओ, हवाल बाँटू चिटनी।’ कहती हुई तेजी से चली गई।
‘मैं तो मैंई बाँट्य लूँगौ, तैने का जाणी तेर्अ बिन्या कछु काम नी हो सकै!’ पप्पू ने सगर्व मुद्रा में कहा, बिना इस बात की परवाह किये कि भन्तो सुन भी पायेगी या नहीं।
इधर भन्तो कुँए से पानी खींच रही थी उधर पप्पू चटनी बाँटने की जुगत कर रहा था। छोटी बच्ची अपने राजा भैया को एक कैरी लुढ़का-लुढ़का कर खिला रही थी। वह कैरी को गेंद की तरह छोटे बच्चे की तरफ लुढ़काती। बदले में बच्चा उसे लुढ़काने के बजाय खाने की चेष्टा करता। बच्ची उसे मना करती, डराती, धमकाती। मगर नन्हीं जान कहाँ डरने वाली थी। ‘चाहे कैरी को बंेध पाये या नहीं, कोशिश तो की ही जा सकती है’ इसी उम्मीद में वह प्रयास कर रहा था। लड़की ने उसके हाथ से कैरी को छीनना चाहा लेकिन वह देने को तैयार नहीं हुआ। कैरी बच्चे के हाथ में, उस पर कब्जे के लिए दोनों भाई-बहिन में संघर्ष छिड़ गया। बच्चे ने जी जान लगा दिया। लड़की से जब कुछ नहीं बना तो उसने बच्चे को धक्का दे दिया। बच्चा गिर पड़ा। उसने कैरी फेंक दी और बिलख-बिलख कर रोने लगा। उसने खड़े होने की चेष्टा नहीं की। पप्पू पास ही एक चपटे पत्थर पर एक दूसरे छोटे पत्थर की मदद से मोटे नमक व लाल मिर्च को पीसने में मग्न था। जैसे ही उसे पता चला कि लाली ने लाला से कैरी छीन ली है इसलिए वह जोर-जोर से रो रहा है तो उसने लाली से कैरी लेकर लाला को दे दी। लाला कुछ देर में शान्त हो गया। इतनी देर में लाली ने रोना मुँह बनाया और रोने लगी। लाला को शायद संतुष्टि का अहसास हो रहा था, इसलिए वह कैरी हाथ में लिए चुपचाप बैठा था। आँसू उसके चेहरे से नीचे पहँुच चुके थे। नाक भी वह रही थी, जो होठों को पार करके (कुछ मुँह के अन्दर भी चली गई) ठोढ़ी पर जा पहुँची। ठोढ़ी पर आकर आँसू और नाक का मिलन हुआ संयुक्त प्रवाह बनियान तक जा पहुँचा था। नीचे लोटने के कारण मिट्टी का भी इसमें समागम हो गया था। प्रतिदिन इस मिश्रण के मिलते रहने के कारण ही शायद उसकी बनियान का रंग कुछ ऐसा मटमैला हो गया था जिसे साफ करना चाय, काॅफी का दाग छुड़ाने का दावा करने वाले टी. वी. विज्ञापनों में दिखने वाले साबुन/पाउडर के भी बस की बात नहीं दिखती थी।
भन्तो कुँए से पानी निकाल कर ला रही थी। उसे आती देख कैरी छिन जाने के कारण रो रही लाली भागती हुई उसकी ओर गई और उसके घाघरे में मुँह छिपाकर सिसकने लगी। शायद माँ के आँचल में वह खुद को अधिक सुरक्षित महसूस कर रही थी। उसने भन्तो के घाघरे में दोनों घुटनों के बीच अपना मुँह छिपाया और दोनों हाथों से भन्तो के दोनों पाँव घुटने के पास से इस तरह कसकर पकड़ लिये कि भन्तो को चलने में दिक्कत महसूस होने लगी। भन्तो धीरे-धीरे आम के पेड़ के नीचे आई और बाल्टी नीचे रखकर उसने सिसकती हुई लाली को गोदी में ले लिया और उसे पुचकारते हुए बोली, ‘का हो गौ लाली, च्यों रो रीय?’
लाली ने कुछ नहीं कहा। बस सिसकती रही। भन्तो आम की छाया में नीचे बैठ गई और लाली को गोदी में अपनी चुनरी से ढ़क लिया। लाली अभी भी सिसक रही थी।
पप्पू ने चटनी बनाकर एक रोटी में ले ली। एक प्याज लिया। उसका जड़ वाला हिस्सा मुँह से काटकर हटा दिया और उसे दोनों हाथों से जोर से दबाया। प्याज फूट गया और उसमें से कस निकलने लगा। फिर उसे पानी से धोया और रोटी के साथ खाना आरंभ किया। लाला अभी भी कैरी हाथ में लिए चुपचाप बैठा था। आँसू सूख गए थे जिससे उसके गालों पर लकीर बन गई थी। जब उसने लाली को भन्तो की गोद में बैठे हुए देखा तो वह उधर आया और गोदी से लाली को हटाकर खुद बैठने की कोशिश करने लगा। रह-रहकर झटके से लाली को अभी भी सिसकियाँ आ रही थी। लाला उसे हटाने की कोशिश करता रहा। अपनी कोशिश में नाकाम होकर वह रोना शुरू करने ही वाला था कि भन्तो ने उसे गोदी में एक तरफ बैठा लिया और स्तनपान कराने लगी। बालक द्वेष भुलाकर स्तनपान करने लगा। पप्पू उधर ही देख रहा था। नशीली मुस्कान के साथ भन्तो से बोला, ‘मौकू दूध पीवे कौ मोकौ नी मिलैगो का?
‘तुम्हारो दिमाक खराब होगो का?
‘दिमाक तो सईय, नीत जरूर खराबअ।’ पप्पू ने खाना खत्म करते हुए कहा। उसकी नजरें वहीं टिकी थीं।
‘हुँ! कतई लाज सरम नीय का? न दिन देखौ, न रात!’ भन्तो ने अपना मुँह फेर लिया, इसलिए कि जिससे पप्पू को पीठ दिखाई दे, शरीर का अग्रभाग नहीं। पप्पू ने कुल्ला किया और पानी पीता हुआ भन्तो की तरफ आया, ‘अरे भाई या झकराड़े में सब कछु रूखो सूखोअ, बस्स एक न्यहाँ ई तो हरियाली है, बाऊअ नी देखन दे का….!’
‘ए…. जी , या मौसम में सब कछु रूखाई-रूखा।
चाहे देखो मिनक-जिनावर, चाहे ताल-तलैया सूखा।।’
ए… जी या मौसम में…।’
‘या झकराड़े में सब पेेड़-पौधे झुलिसगे, ई पेड़ ही तो हर्योअ। (भन्तो के शरीर की तरफ इशारा करते हुए) हर्योई नीय्अ, अचम्बे की बात , कि यामै झकराड़े में बी नारंगी पक रीय! ई पेड़ बी तो तबी हर्यो रहैगो जब यामै याकौ धणी पाणी देतौ रह्गौ!’ कहते हुए पप्पू ने भन्तो के सिर पर पानी डाला। भन्तो ने सिर आगे की तरफ कर लिया। पानी उसकी पीठ पर गिरा और पीछे से ब्लाउज को भिगोकर नीचे तक पहुँच गया। उसके शरीर में हल्की सी सिहरन दौड़ी।
‘पागिल होगे थम तो…!’ भन्तो ने नवविवाहिता की तरह लजाते हुए कहा।

भन्तो वापस घर जा चुकी थी। पप्पू आम के नीचे जमीन पर लेटा आम में लगी कैरियों को देख रहा था। आ रही कैरियों की मात्रा को देखकर मन में संतोष हो रहा था कि इस बार अगर सब कुछ ठीक-ठाक रहा तो थोड़ा मुनाफा होगा। पप्पू के मन ही मन उसके भूत, वर्तमान और भविष्य में कुश्ती हो रही थी। तीनों ही क्षीणकाय होने के बावजूद स्वयं को दूसरे से श्रेष्ठ साबित करने की कोशिश कर रहे थे, मानो तीनों ने शरीर फुलाने वाला कैप्सूल खा लिया हो और एक-दूसरे को धोखा देने की काशिश कर रहे हांे।
पप्पू सोच रहा था कि एक महीने बाद तक कैरियों और आमों को बेचने पर यदि चार-पाँच सौ रुपये बच गए तो पहले वह हरिराम के तीन सौ रुपये चुकाएगा जो उसने सचिन की फीस भरने के लिए लिये थे। बचे पैसों से बच्चों के लिए कपड़े खरीदेगा। भन्तो की इकलौती लूगड़ी (चुनरी) भी तो तार-तार हो चुकी थी, उसे भी सस्ती लूगड़ी ले आएगा।
पप्पू कैरियों की तादाद को देख अंदाजा लगा रहा था कि ये तीन-चार मन कैरियाँ तो होंगी ही। एक महीने बाद तक इनका आकार थोड़ा और बढ़ेगा। कुल मिलाकर अंत में कैरियाँ पाँच मन से कम नहीं उतरंेगी। जिनमें से एक मन का वह आम पकाएगा और उन्हें आम के रूप में बेचेगा। कैरी तो अनाज के बराबर बेचनी पड़ती है क्योंकि उनका भाव इतना ही है। अनाज यानि गेहूँ का भाव चार-पाँच रुपये किलो और यही भाव कैरी का। आम को वह आधा-ऊध बेच सकेगा क्योंकि आम आठ-दस रुपये किलो तो है ही…। इस तरह चार मन कैरी बेचने पर चार मन अनाज आएगा आठ-नौ सौ रुपये का। उसमें से एक मन तो वह खाने के लिए रखेगा बाकी तीन मन को बेच देगा। एक मन आम के बदले दो मन अनाज यानी…..!

अगले दिन खाना खाकर सुबह नौ बजे वह फिर आम की रखवाली करने चल दिया। और दिन वह सात बजे कलेवा करके ही चला जाता था। आज घर में मेहमान आने के कारण वह थोड़ा देर से निकल पाया। दूर से ही वह आम को देखने की कोशिश कर रहा था। आम उसे धुँधला सा दिखाई दे रहा था। उसे आम के नीचे कोई हाथ ऊँचा करते हुए कुछ करता हुआ नजर आया। पहले तो उसे लगा कि यह उसका वहम मात्र है लेकिन ज्यों-ज्यों वह नजदीक पहुँचता गया उसका वहम असलियत में बदलने लगा। वास्तव में एक आदमी मिट्टी के डलों से कैरी झड़ा रहा था। पप्पू को आता देख वह अपना झोला ले भाग गया। पप्पू जब आम पर पहुँचा तो उसने देखा कि आम के कुछ हरे पत्ते झड़े पड़े हैं तथा साथ ही मिट्टी के कुछ डले भी। आम के पत्ते कैरियों के साथ झड़ गये थे। यह सब देखकर पप्पू का मन खिन्न हो गया। पहले उसे थोड़ा गुस्सा आया लेकिन फिर उसने स्वयं को दिलासा देते हुए मन ही मन कहा, ‘ले जाने दो साले को! ज्यादा से ज्यादा दो-तीन किलो कैरी ले गया होगा! अगर इसी से वह धनवान हो सकता है तो उसे हो जाने दो…..!’ मन ही मन कुढ़कर वह पत्तों को और मिट्टी के डलों को हटाने लगा। रह-रहकर मन में कैरी चुराने वाले के लिए कभी गालियाँ आ रही थीं तो कभी-कभी क्षमाभाव भी!
अभी कुछ देर ही बीती थी कि आम का असली मालिक सुरज्ञान सिंह अपने बच्चों के साथ आता हुआ दिखाई दिया। उन्हें आता देख पप्पू को कुछ अनिष्ट की आशंका सी होने लगी। जाने क्यों कुछ लोगों को देखकर ही लगता है कि हमें इनसे बचकर रहना चाहिए, ये हमारा बड़ा नुकसान कर सकते हैं, भले ही अब तक उन्होंने हमारा कुछ बिगाड़ा न हो। पप्पू को सुरज्ञान उन्हीं लोगों में से एक लगता था। उसने उसका आम भी मजबूरीवश लिया था। लेने के पहले बहुत सोचा लेकिन जब अन्यत्र कहीं कुछ काम धन्धा नहीं मिला तो दिल मजबूत करके उसने सुरज्ञान पटेल का आम लिया था।
‘और भाई पप्पू, का हाल्अ…? सुरज्ञान सिंह ने अपने पहुँचने का संकेत देते हुए कहा। उसके साथ उसके दो लड़के थे- एक बारह-तेरह साल का और दूसरा आठ-नौ का।
‘टैम पास हो रोय पटेल जी…!’ पप्पू ने धीमे स्वर में कहा।
दोनों में काफी बातें हुई। सुरज्ञान सिंह पूछता और पप्पू धीमे से संक्षिप्त सा उत्तर दे देता। पप्पू ने उसे कैरी चोरी होने वाली बात नहीं बताई क्योंकि बदले में वह उसकी झूठी सहानुभूति नहीं चाहता था। सुरज्ञान सिंह के लड़के आम पर चढ़कर खेल रहे थे। खेल-खेल में कैरियाँ झड़ जा रही थी- इसकी उन्हें परवाह नहीं थी या शायद उनके परिजनों द्वारा उन्हें परवाह न करने के लिए कहा गया था। पप्पू की नजर लड़कों और उनकी गतिविधियों पर थी लेकिन वह उनसे क्या कह सकता था!
‘पप्पू, आर अबकै तो तू बाजी मार्यगौ। सात मण से कम नी उतरै अबकै कैरी!’ सुरज्ञान सिंह ने चलने की तैयारी करते हुए कहा।
‘तीन मण से ज्यादा नी उतरै पटेल जी! नफा कौ कछु पतो नीय…! भगवान ने चाई तो सौ-पचास रुपया मिल जायंेगे, वरना…!’ पप्पू ने उसी लहजे में कहा।
कुछ देर खामोश रहने के बाद सुरज्ञान सिंह बोला, ‘आर, ला दो-चार कैरी तोड़ दै, लौंजी (कैरी की सब्जी) बणा लिंगे।’ उसने अपने आने का उद्देश्य अब बताया।
पप्पू को पता था कि सुरज्ञान सिंह क्यों आया था! मन तो कर रहा था कि सुरज्ञान सिंह और उसके लड़कों को भला-बुरा कहके भगा दे या कम से कम कैरी देने से इन्कार कर दे लेकिन वह ऐसा नहीं कर पाया। उसने मरे स्वर में कहा, ‘तोड़ लेओ पटैल जी….!’
सुरज्ञान सिंह यही तो चाह रहा था। उसने अपने लड़कों से कैरी तोड़ने को कहा। लड़कों ने ऊपर चढ़कर नीचे झट से कैरियों का ढ़ेर लगा दिया। पप्पू का मन भर आया था- शायद गुस्से के घूँट पी-पीकर। सुरज्ञान सिंह ने दो-चार कैरियों के बदले पूरी पोटली भर ली थी। सोचा लोंजी खराब तो होती नहीं है, चार-पाँच दिन तक खायेंगे…..!

पप्पू आम के नीचे अकेला बैठा था। उसे गुस्सा आ रहा था लेकिन किस पर? पता नही! कैरी चुराने वाले पर, या सुरज्ञान पटेल पर, या उसके लड़कों पर, या अपने आप पर? शायद सभी पर लेकिन स्वयं पर सबसे अधिक क्योंकि उसके देखते-देखते ही तो सब ने नुकसान किया था लेकिन वह कुछ नहीं कर पाया। अपनी असमर्थता ही उसे सर्वाधिक खल रही थी। अब वह पक्षियों को भी नहीं भगा रहा था। सिर पकड़कर बैठा था।
दो-एक घंटे ऐसे ही बीत गए। आज भंतो भी नहीं आने वाली थी क्योंकि वह खुद रोटी खाकर चला था सुबह ही! कुछ अपने साथ बाँध भी लाया था इसलिए कि अगर तीन-चार बजे फिर भूख लगी तो खा लेगा। लेकिन आज भूख कहाँ थी। जैसे-तैसे उसने खुद को तैयार किया और फिर पक्षी उड़ाने लगा- ‘हुर्र….हुर्र…! हा…..हा…! हुर्र…हा!  हरिया…हरिया…!’
सहसा पप्पू को अंधेरा सा होता नजर आया। जब उसने इसका कारण जाना तो वह भीषण गर्मी में भी काँप उठा। उत्तर में आसमान धूल से अटा मटमैला हुआ जाता था। यह भयानक आँधी का संकेत था। पप्पू को समझ नहीं आया कि अब वह क्या करे! अगर यह आँधी इधर से आ गई तो आम से सारी कैरियाँ झड़ जाएँगी और फिर उन्हें अनाज के दो बार यानी दो रुपया किलो…..!
ज्यों-ज्यों आँधी अपना विकराल रूप धारण किये करीब आती जा रही थी पप्पू सहम-सहम उठता था। ऐसे में उसके पास एक ही सहारा बचा था-‘दैवीय कृपा’ का सहारा। देवी-देवता ऐसे समय ही तो काम आते हैं। बरस भर हम उनकी परिक्रमा क्यों लगाते रहते हैं, इसीलिए न, कि संकट के समय वे हमारे काम आयें! पप्पू ने भी हाथ जोड़कर प्रार्थना करना शुरू कर दिया, ‘देवी मइया, या आँधी कू रोक दै, कै दूसरी दिशा में मोड़ दै! देवी मइया, ई इत्अ आगी तो मैं बर्बाद हो जाऊँगौ! मैया तेरी किरपा सेई तो मैं और मेरे बालिक जिन्दा है, जे तैने मेरी नी सुणी तो हम बिना मारे मर जायेंगे! तू ई तो हमारी पालनकर्ता है… तेरी मरजी से ई हम जिन्दा हैं….जे तेरो हाथ हमपे से हटगौ तो हम क्हाँ जायेंगे….?’ कुछ इसी तरह की विनती घर बैठी भन्तो कर रही थी। दोनों पति-पत्नी को देवी माँ पर विश्वास था।
जब आँधी बहुत नजदीक आ गई और कुछ होता नहीं दिखा तो पप्पू ने जोर-जोर से प्रार्थना करना शुरू कर दिया, ‘देवी मइया, आँधी रोक दै….तेरी जात करूँगौै… रोजीना तेरी जात करूँगौ….हम सब घरके जात करवे आयेंगे…. आजई तिलकडंडो दऊँगौ…!’
जब जात और तिलकडंडो से भी काम नहीं बना और आँधी बहुत नजदीक आ गई तो पप्पू ने प्रलोभन देना शुरू किया देवी माँ को खुश करने के लिए, ‘‘मइया लोंग को जोड़ा चिंडाऊँगौ….दो रुपया कौ परसाद चिंडाऊँगौ….पाँच रुपिया कौ परसाद…ग्यारह रुपिया को…..इक्कीस रुपिया…..!
आँधी सिर पे आ चुकी थी। उससे पहले ठंडी हवा का झौंका आया। प्रचण्ड गर्मी में शीतलता प्रदान करने वाला ठंडी हवा का झौंका भी पप्पू को न जाने क्यूँ कष्टकर लगा!
आँधी आ चुकी थी। देखते ही देखते पत्ते शोर करने लगे। आम की शाखाएँ जोर-जोर से हिलने लगीं और एक-दूसरे से टकराने लगी। कैरियाँ पट-पट की आवाज़ के साथ गिरने लगी। पप्पू मूक दर्शक की भाँति सब देख रहा था। वह खुद को कुछ भी करने में असमर्थ पा रहा था। वह कर भी क्या सकता था। आँखों में मिट्टी घुसने लगी।
ज्यों-ज्यों झड़ी कैरियों की तादाद बढ़ने लगी त्यांे-त्यों एक मात्र सहारे ‘देवी मइया’ से पप्पू का विश्वास उठने लगा। जब आम के नीचे छोटी-बड़ी कैरियों का ढेर लग गया तो उसका विश्वास टूट गया। कुछ आँख में मिट्टी जाने की वज़ह से, कुछ दुःख, गुस्से और असमर्थता के कारण उसकी आँखों से आँसू बह चले थे। उसका गला भर आया था। पल भर पहले जिस देवी मइया से वह मिन्नतें कर रहा था, अब उस पर गुस्सा आ रहा था और कभी उसकी शक्ति पर तो कभी स्वयं उसके होने पर उसे शक होने लगा था।
आँधी के बाद थोड़ी बूँदा-बाँदी भी हुई जिससे गरमी कुछ कम हुई।
कुछ देर बाद सब कुछ शांत हो गया। आँधी निकल चुकी थी। आधी से अधिक कैरियाँ झड़ चुकी थीं। भन्तो बच्चों को घर छोड़कर खाद का खाली कट्टा ले दौड़ी चली आई थी। दोनों पति-पत्नी चुप थे। शायद दोनों मन ही मन विलाप कर रहे थे। दोनों ने किसी से कुछ नहीं कहा और झड़ी हुई कैरियों को समेटकर कट्टे में भरने लगे। कट्टा भर गया। बची कैरियाँ परात में इकट्ठी की । अभी भी कुछ छोटी, कानी-कुचैली कैरियाँ बच गई थीं।
पप्पू ने कट्टे का मुँह बाँधकर सिर पर रखा और भन्तो ने परात। दोनों अपने घर की ओर चल दिये। एक-दूसरे से बिना कुछ कहे। कहने को बचा ही क्या था। दोनों के आँसुओं में उनकी बातें, उनके सारे सपने धुल चुके थे।
उनका घर गाँव के बीचों-बीच था चौराहे के पास। आँधी के साथ बारिश आने से मौसम में ठंडक आ गई थी जिससे गाँव के लोग बड़ी राहत महसूस कर रहे थे। लोग घरों के बाहर निकल आये थे। कुछ लोग चैराह पर खड़े हँसी-ठल्ला कर रहे थे। पप्पू और भन्तो उधर से ही निकल रहे थे। एक बार पप्पू के मन ने धीरे से पप्पू से कहा कि क्यूँ न वह भी उन लोगों में शामिल हो जाए…! गाँव के लोग सुकून महसूस कर रहे हैं, फिर वह क्यों दुःखी है!
पप्पू लोगों के कहकहे को सुनता, अनसुना करता भन्तो के साथ अपने घर की ओर चला जा रहा था।








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